October 25, 2026 5:57 pm

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इस दिवाली केवल घर नहीं, किसी के जीवन में भी रोशनी जलाएँ।

इस दिवाली केवल घर नहीं, किसी के जीवन में भी रोशनी जलाएँ।

डॉ. विक्रम चौरसिया

कल्पना कीजिए, जिस रात आपका घर दीपों की रोशनी से जगमगा रहा हो, अपनों के बीच हँसी-खुशियाँ बाँटी जा रही हों और मिठाइयों की मिठास रिश्तों में घुल रही हो, उसी रात किसी गरीब बच्चे की आँखें एक छोटी-सी इच्छा पूरी होने की राह देख रही हों, कोई माँ अपने बच्चों की जरूरतें पूरी न कर पाने की विवशता से मन ही मन टूट रही हो और कोई बुजुर्ग अकेलेपन में अपनों के साथ की प्रतीक्षा कर रहा हो। एक ओर उत्सव की जगमगाहट हो और दूसरी ओर अभाव की खामोशी क्या दूसरों के दुःख से आँखें मूँदकर हमारी खुशियाँ पूरी हो सकती हैं?

इस दिवाली एक पल ठहरकर स्वयं से पूछिए क्या हमारा कर्तव्य केवल अपने घर को रोशन करना है, या किसी ऐसे जीवन में भी उम्मीद का दीप जलाना है, जहाँ वर्षों से अभाव का अँधेरा पसरा है?

दीपावली केवल दीप जलाने और उत्सव मनाने का पर्व नहीं, बल्कि अँधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा है। दीपक स्वयं जलकर दूसरों को उजाला देता है। उसका यही गुण हमें सिखाता है कि जीवन की सार्थकता केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में भी है। इसलिए इस बार अपने घरों को रोशन करने के साथ उन लोगों तक भी खुशियों का प्रकाश पहुँचाने का संकल्प लें, जिनके जीवन में अभाव और अवसरों की कमी ने उम्मीदों को धुँधला कर दिया है।

जरा सोचिए, यदि मनुष्य के भीतर मानवता, करुणा, प्रेम और संवेदना ही न हो, तो उसके इंसान होने का अर्थ क्या रह जाता है? किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके धन, पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके आचरण और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार से होती है। किसी दुखी चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी निराश मन में आशा जगाना और किसी जरूरतमंद का सहारा बनना ही वे कर्म हैं, जो जीवन को वास्तविक अर्थ देते हैं।

हम सभी जानते हैं कि जीवन अनमोल है, लेकिन इसकी अंतिम घड़ी कब आ जाए, कोई नहीं जानता। जन्म के बाद हमारी जीवन-यात्रा कितनी लंबी होगी, इसका निश्चित भरोसा किसी को नहीं। फिर नफरत, ईर्ष्या, छल-कपट और अहंकार में जीवन क्यों गँवाएँ? क्यों न अपने समय, संसाधनों और सामर्थ्य का कुछ हिस्सा मानवता की सेवा में लगाएँ? आखिरकार, हमारे जाने के बाद हमारी संपत्ति नहीं, बल्कि हमारे कर्म और दूसरों के जीवन पर छोड़ी गई हमारी छाप ही हमें याद रखने का आधार बनती है।

हमारे आसपास आज भी अनेक बच्चे शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, युवा अवसरों के अभाव में संघर्ष कर रहे हैं और कई परिवार रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए जूझ रहे हैं। ऐसे में किसी बच्चे को किताबें उपलब्ध कराना, किसी जरूरतमंद परिवार को भोजन देना, किसी युवा को आगे बढ़ने में सहयोग करना या किसी असहाय व्यक्ति का हाथ थामना भी दीपावली की सच्ची भावना है।

इसके लिए धनवान होना जरूरी नहीं। सेवा का मूल्य उसके पीछे छिपी निस्वार्थ भावना से तय होता है, उसकी राशि से नहीं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया छोटा-सा प्रयास भी किसी के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है। यदि हमारे सहयोग से किसी बच्चे की पढ़ाई जारी रह सके, किसी परिवार को दो वक्त का भोजन मिल सके या किसी निराश व्यक्ति को फिर से आगे बढ़ने का हौसला मिले, तो इससे बड़ी खुशी क्या होगी?

मानवता का दायरा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं होना चाहिए। धरती पर रहने वाले जीव-जंतुओं और प्रत्येक प्राणी के प्रति दया तथा संवेदनशीलता रखना भी हमारा नैतिक दायित्व है। त्योहार की खुशियाँ मनाते समय हमें ध्यान रखना चाहिए कि हमारा उत्सव किसी दूसरे के भय, पीड़ा या कष्ट का कारण न बने। सच्ची खुशी वही है, जिसमें हमारी प्रसन्नता के साथ दूसरों की सुरक्षा और सुख का भी ध्यान रखा जाए।

इसी तरह, हमें अपने भीतर के अँधेरे को भी मिटाना होगा। झूठ की जगह सत्य, घृणा की जगह प्रेम, ईर्ष्या की जगह सद्भाव और स्वार्थ की जगह सेवा को अपनाना होगा। जाति, धर्म, वर्ग, भाषा या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव करना मानवता की भावना के विपरीत है। किसी की मजबूरी का उपहास उड़ाने के बजाय उसका हाथ थामना और हर व्यक्ति को सम्मान देना ही हमारे संस्कारों की वास्तविक पहचान है।

जिस राष्ट्र में हमने जन्म लिया, उसके प्रति हमारा प्रेम केवल शब्दों और नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसकी वास्तविक शक्ति ऐसे समाज के निर्माण में है, जहाँ हर व्यक्ति को सम्मान, न्याय और आगे बढ़ने का अवसर मिले। जब समाज का वंचित व्यक्ति भी स्वयं को सम्मानित और सहभागी महसूस करेगा, तभी विकास और खुशहाली का प्रकाश हर दिशा में फैल सकेगा।

आइए, इस दीपावली स्वयं से संकल्प लें कि हम अपनी सामर्थ्य के अनुसार निस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की मदद करेंगे, वंचित बच्चों की शिक्षा और युवाओं के अवसरों में यथासंभव योगदान देंगे, किसी मनुष्य या जीव-जंतु को पीड़ा पहुँचाने से बचेंगे और अपने व्यवहार में ईमानदारी, करुणा तथा समानता को स्थान देंगे। अपनी खुशियों में उन लोगों को भी शामिल करने का प्रयास करेंगे, जिनके पास उत्सव मनाने के साधन कम हैं।

याद रखिए, अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा-सा दीपक उसे चुनौती देने का साहस रखता है। जब एक दीप से दूसरा दीप जलता है, तो उजाला बढ़ता जाता है। उसी तरह, जब एक व्यक्ति निस्वार्थ सेवा की शुरुआत करता है, तो दूसरे भी प्रेरित होते हैं। समाज में सकारात्मक बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती; कई बार एक छोटा-सा मानवीय प्रयास भी किसी के जीवन की दिशा बदल सकता है।

दिवाली का वास्तविक अर्थ केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि दिलों में संवेदना जगाना, समाज में सद्भाव बढ़ाना और जरूरतमंदों के जीवन में आशा का उजाला पहुँचाना भी है।

इस बार जब आप अपने घर में दीप जलाएँ, तो अपने मन में भी एक संकल्प जगाएँ मेरे कारण किसी का दुःख कम हो, किसी के चेहरे पर मुस्कान आए और किसी जरूरतमंद को आगे बढ़ने का अवसर मिले।

क्योंकि सच्ची दिवाली वही है, जब हमारे घर की रोशनी किसी दूसरे के जीवन तक पहुँचे, हमारी खुशियों में किसी वंचित की मुस्कान शामिल हो और हमारे प्रयासों से किसी के जीवन में उम्मीद का नया सवेरा आए।

आइए, इस दिवाली दीप भी जलाएँ, दिल भी जोड़ें और मानवता का उजाला हर उस जीवन तक पहुँचाएँ, जिसे इसकी सबसे अधिक जरूरत है।

आप सभी को प्रेम, करुणा, सद्भाव और मानवता से परिपूर्ण दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

 

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