गाजियाबाद,रविवार,22-03- 2026 को आर्य समाज अवन्तिका की संरक्षिका डा प्रतिभा सिंघल ने विक्रमी संवत 2083 की देशवासीओं को बधाई एवं शुभकामनायें प्रेषित करते हुए कहा कि विक्रमी संवत चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि से प्रारंभ होता है।विक्रम संवत महान,प्रतापी, सूर्य के समान तेजस्वी,न्यायकारी, महाराजा विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित है।ईस्वी सन् ईसा के नाम से प्रचलित है।ईस्वी सन् गुलामी का प्रतीक है।जनवरी वाला कैलेंडर तो भारत से हटना चाहिए।विक्रमी सम्वत वाले केलेंडर को सरकारी मान्यता मिलनी चाहिए।विक्रम संवत ईस्वी सन् से 57 वर्ष पूर्व से प्रचलित है।मानसिक गुलामी के कारण भारतीय युवा जोर- शोर से मनाने लगे हैं।यह ऐतिहासिक तिथि है।इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जी का राज्याभिषेक हुआ था।इसी दिन महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की थी,जो एक धार्मिक,राजनीतिक,सामाजिक आंदोलन है।इसी दिन स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी।विक्रमी सम्वत अपनी अस्मिता है,अपना गौरव है।अपनी पहचान है।विक्रमी संवत को धूमधाम से मनायें।घर के बाहर नया झंडा लगायें।यज्ञ कीजिए।कीर्तन कीजिए।सांस्कृतिक कार्यक्रम कीजिए।बच्चों को मनोरंजन करायें।आपस में बधाई दीजिए।राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ब्रिटिश शासन काल में 1 जनवरी वाले नव वर्ष के विरोध में और विक्रमी संवत के समर्थन में कविता लिखी थी।(1 जनवरी )यह नववर्ष हमें स्वीकार नहीं,अपना यह त्यौहार नहीं,अपनी यह रीत नहीं, अपना यह व्यवहार नहीं,राष्ट्रकवि दिनकर जी के संदेश को माने और अपना नववर्ष हर्षोल्लास से मनायें।सारी प्रकृति तरह-तरह के फूलों से सजी हुई दुल्हन सी मनोहर लग रही है।कोयल कूक रही है.सूर्य का प्रकाश तेज है।नई पीढ़ी के युवा- युवतियों से अनुरोध है -पाश्चात्य संस्कृति में डूबे रहने से हमारा अपना अस्तित्व मिट्टी में मिल रहा है।हमारी अपनी कोई पहचान नहीं रहेगी।दादी-बाबा अपने पोते- पोतियों के साथ नव वर्ष मनाए।












