फैटी लिवर से लिवर फेलियर तक, क्या इस बढ़ती समस्या को रोका जा सकता है
अनिल कुमार गुप्ता दिल्ली
अक्सर यह माना जाता है कि लिवर से जुड़ी बीमारियां केवल शराब के सेवन से होती हैं, लेकिन आज की हकीकत इससे कहीं अलग है। बड़ी संख्या में लोग ऐसे भी हैं जिन्हें बिना या बहुत कम शराब पीने के बावजूद फैटी लिवर की समस्या हो रही है। खासकर शहरी और आधुनिक लाइफस्टाइल अपनाने वाले लोगों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। फैटी लिवर एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है। शुरुआती चरण में इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए अक्सर यह बीमारी रूटीन हेल्थ चेकअप या किसी अन्य जांच के दौरान ही पता चलती है और कई लोग लंबे समय तक इससे अनजान रहते हैं।
हालांकि कुछ लोगों में समय के साथ यह फैट लिवर में सूजन और नुकसान पैदा कर सकता है, जिससे धीरे-धीरे स्कारिंग यानी फाइब्रोसिस होने लगता है और लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह स्थिति गंभीर रूप लेकर आगे चलकर लिवर से जुड़ी जटिल समस्याओं का कारण बन सकती है। आज के समय में बढ़ता मोटापा, डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंस, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा शुगर व अनहेल्दी फैट वाला आहार, साथ ही अल्कोहल का सेवन—ये सभी फैक्टर मिलकर फैटी लिवर के खतरे को बढ़ाते हैं और बीमारी की गति को तेज करते हैं।
मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज के लिवर ट्रांसप्लांट एंड बिलियरी साइंसेज, रोबोटिक सर्जरी, पीडियाट्रिक लिवर ट्रांसप्लांट विभाग के डायरेक्टर डॉ. राजेश डे ने बताया “क्योंकि फैटी लिवर अक्सर बिना लक्षण के होता है, इसलिए इसकी पहचान के लिए मेडिकल जांच जरूरी होती है। इसमें ब्लड टेस्ट के जरिए लिवर फंक्शन की जांच, अल्ट्रासाउंड से लिवर में फैट का पता लगाना, फाइब्रोस्कैन से लिवर की कठोरता और शुरुआती स्कारिंग का आकलन, और जरूरत पड़ने पर CT या MRI स्कैन शामिल होते हैं। कुछ मामलों में लिवर बायोप्सी भी की जाती है ताकि स्थिति का विस्तार से आकलन किया जा सके। समय पर डायग्नोसिस होने से इलाज शुरू करने और बीमारी को आगे बढ़ने से रोकने में काफी मदद मिलती है। अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर को लाइफस्टाइल में बदलाव के जरिए काफी हद तक सुधारा और कई मामलों में रिवर्स भी किया जा सकता है। वजन को नियंत्रित रखना, संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखना—ये सभी कदम लिवर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन अक्सर लोगों को बीमारी का पता तब चलता है जब यह आगे बढ़ चुकी होती है।“
डॉ. राजेश ने आगे बताया “यदि फैटी लिवर का समय पर इलाज न किया जाए, तो यह सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है, जिसमें लिवर में ज्यादा स्कारिंग हो जाती है और उसकी कार्यक्षमता काफी कम हो जाती है। इस अवस्था में पीलिया, पेट में पानी भरना (एसाइटिस), पैरों में सूजन, शरीर में टॉक्सिन जमा होने के कारण भ्रम की स्थिति, और लिवर कैंसर का बढ़ा हुआ खतरा जैसी जटिलताएं सामने आ सकती हैं। जब लिवर अपनी जरूरी कार्यक्षमता खो देता है, तब विशेष इलाज की जरूरत होती है और कुछ मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट ही सबसे प्रभावी विकल्प बन जाता है, जिससे मरीज को लंबी और बेहतर जिंदगी मिल सकती है।












