जगाधरी, हनुमान गेट स्थित
जिसके/ दैनिक हिन्दी बाल जी सत्यम नागपाल, दौरान परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी के शिष्य गुरु ज्ञानानंद जी ने मानव जीवन के उत्थान हेतु कई बहुमूल्य सूत्रों को उजागर किया। उन्होंने सेवा का महत्व समझाया और कहा कि केवल मनुष्य का शरीर लेकर पैदा हो जाना ही मनुष्यता की पहचान नहीं है। वास्तविकता में हम मनुष्य तभी कहलाते हैं जब हमारे भीतर मनुष्यत्व के गुण उजागर होते हैं। इस सृष्टि में उत्पन्न कोई भी जीव जन्तु अपनी प्रकृति और स्वभाव से बँधे हुए हैं और प्रकृति द्वारा निर्धारित कार्यों में ही संलग्न रहते हैं। आगे स्वामी जी ने विस्तार पूर्वक समझाते हुए कहा कि मनुष्य को जिस परिपेक्ष्य और समाज में जन्म मिलता है उसका आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व उसी के अनुकूल ढल जाता है। मानव को सृष्टि का सिरमौर कहा गया है क्योंकि वह अपने लिए आत्मिक उत्थान के द्वार खोल सकता है। चुनाव करने का एक मात्र विकल्प मनुष्य के पास है परन्तु हम अपनी संकीर्ण सोच और मिथ्या अहंकार के वशीभूत होकर मनुष्यत्व को भुलाकर स्वयं को पशु की श्रेणी से भी नीचे गिरा कर अपना पतन कर लेते हैं। प्रकृति ने मनुष्य को विशेष बौद्धिक क्षमता प्रदान की है जिससे वह चुनाव कर सकता है किन्तु बुद्धि के भीतर सही या ग़लत का चुनाव करने की शक्ति को विवेक कहते हैं जो केवल सत्संग और सुसंगति से ही उजागर हो सकता है। जब विवेक जागृत होता है तभी हम अपने जीवन एवं जीवन में मिले सभी संसाधनों का सदुपयोग कर पाते हैं। आशुतोष महाराज जी कहते हैं कि विलुप्त हुई मानवता को केवल ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही पुनर्जीवित किया जा सकता है। ब्रह्मज्ञान हमारे दृष्टिकोण को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर देता है और हम अपनी सोच के संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर परोपकार एवं जन कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं। तभी हम मानवता के उत्थान हेतु सेवा में अपने जीवन को लगाते हैं। जब गुरु अपने शिष्य को सेवा में लगाता है तो वह उसके पुरुषार्थ को सामाजिक उत्थान हेतु उपयोग करने की कला दे रहा होता है क्योंकि गुरू शिष्य को कभी अपनी निजी सेवा में नहीं लगाते अपितु वे तो उसे अपना तपोबल प्रदान करके इतना सशक्त एवं योग्य बना देते हैं कि वो आत्म कल्याण के साथ समाज में और भी कई जीवों का उद्धार कर पाए। सेवा कई प्रकार की हो सकती है लेकिन वास्तविक रूप में अपने अहंकार एवं स्वार्थ को त्यागकर अपने जीवन एवं संसाधनों को धर्म कार्य एवं समाज कल्याण में लगाना ही सेवा कहलाता है। एक सच्चा सेवादार अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता और अपनी प्रत्येक श्वास को मानवता हेतु समर्पित कर देता है। सेवा से केवल समाज का कल्याण नहीं होता अपितु मनुष्य के भीतर करुणा, विनम्रता और आत्मिक चेतना का भी विकास होता है। जब सेवा कार्य प्रेम, संवेदना और समर्पण के साथ किया जाता है, तब वही कार्य साधना बनकर समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विश्व शांति की प्रार्थना एवं सामूहिक ध्यान साधना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।












