October 17, 2026 11:14 pm

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मिशन डेमोग्राफी: इललीगल माइग्रेंट्स (डिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल्स) एक्ट1983 क़ा दुष्प्रभाव- अवैध घुसपैठियों पर सरकार का चलेगा डंड-भारत की बदलती जनसांख्यिकीय चुनौती का व्यापक समग्र विश्लेषण

 

भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न केवल आँकड़ों का विषय नहीं बल्कि संविधान, नागरिकता, मानवाधिकार, लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के जटिल संतुलन से जुड़ा हुआ है

मिशन डेमोग्राफी केवल अवैध घुसपैठ के विरुद्ध अभियान नहीं बल्कि भारत के भविष्य की सामाजिक, राजनीतिक और सुरक्षा संरचना से जुड़ा प्रश्न बन चुका है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में अवैध घुसपैठ, सीमाई सुरक्षा और जनसंख्या संरचना में हो रहे बदलावों को लेकर बहस कोई नई नहीं है,लेकिन वर्ष 2026 में यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा विमर्श के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार ने मिशन डेमोग्राफी के तहत जनसांख्यिकीय परिवर्तन पर एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा करके यह संकेत दिया है कि अब अवैध प्रवासन को केवल कानून-व्यवस्था या मानवीय समस्या के रूप में नहीं,बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतांत्रिक संतुलन, सीमा प्रबंधन, संसाधनों पर दबाव और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी व्यापक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री ने जिस अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज की बात कही, उसका सीधा संबंध उन क्षेत्रों से जोड़ा जा रहा है जहाँ सरकार के अनुसार अवैध घुसपैठ,सीमा पार गतिविधियों और संगठित बसावट के कारण जनसंख्या संरचना में असामान्य बदलाव दिखाई दे रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी बनाई है,जिसका उद्देश्य अवैध आप्रवास,सीमाई घुसपैठ,मतदाता पहचान, फर्जी दस्तावेज, सीमा प्रबंधन और जनसंख्या असंतुलन जैसे मुद्दों का व्यापक अध्ययन करना है। इस पूरी बहस के केंद्र में एक पुराना और विवादित कानून भी फिर चर्चा में आ गया है, आईएमडीटी एक्ट,1983, जिसे आलोचक असम में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का बड़ा कारण मानते हैं, जबकि समर्थक इसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताते रहे।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि आज मिशन डेमोग्राफी को लेकर जो राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष दिखाई दे रहा है,उसकी जड़ें असम आंदोलन,अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ और भारतीय लोकतंत्र में वोट बैंक राजनीति के आरोपों तक जाती हैं। यही कारण है कि सरकार अब डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट की नीति को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की दिशा में सक्रिय दिखाई दे रही है।
साथियों बात अगर हम भारत में अवैध प्रवासन क़े प्रश्न को समझने की करें तो, यह विशेष रूप से पूर्वोत्तर राज्यों,खासकर असम से जुड़ा रहा है। असम लंबे समय तक बांग्लादेश से होने वाली कथित अवैध घुसपैठ का केंद्र माना जाता रहा।1970 और 1980 के दशक में यह मुद्दा इतना बड़ा बन गया कि वहाँ व्यापक जन आंदोलन शुरू हुआ,जिसे असम आंदोलन कहा गयाआंदोलनकारी संगठनों का आरोप था कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी राज्य की जनसंख्या संरचना बदल रहे हैं,स्थानीय संस्कृति और भाषाई पहचान पर दबाव बढ़ रहा है तथा मतदाता सूचियों में बाहरी लोगों के नाम शामिल होने से लोकतांत्रिक संतुलन प्रभावित हो रहा है। इसी पृष्ठभूमि में 1983 में इललीगल माइग्रेंट्स (डिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल्स) एक्ट यानी आईएमडीटी एक्ट लागू किया गया। यह कानून केवल असम में लागू था और इसका उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान करना बताया गया था।
साथियों, आईएमडीटी एक्ट की सबसे बड़ी विशेषता और विवाद यही था कि इसमें किसी व्यक्ति को विदेशी साबित करने की जिम्मेदारी राज्य और शिकायतकर्ता पर डाली गई थी। भारत के बाकी हिस्सों में लागू फॉरेनर्स एक्ट,1946 के तहत यदि किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का संदेह होता था तो उस व्यक्ति को स्वयं साबित करना पड़ता था कि वह भारतीय नागरिक है।लेकिन आईएमडीटी एक्ट में उल्टा प्रावधान था। आलोचकों ने कहा कि इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान करना लगभग असंभव हो गया। शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति को विस्तृत प्रमाण देने पड़ते थे,जबकि प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि हजारों मामलों में कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती थी। यही कारण था कि कई राष्ट्रवादी और क्षेत्रीय संगठनों ने इसे घुसपैठियों को संरक्षण देने वाला कानून कहना शुरू कर दिया।असम में जनसंख्या परिवर्तन को लेकर जो चिंता व्यक्त की जाती रही, उसका संबंध केवल आबादी की संख्या से नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक पहचान से भी था। कई जिलों में धार्मिक और भाषाई संरचना बदलने के दावे किए गए। स्थानीय संगठनों का आरोप था कि अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए जा रहे हैं, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो रहे हैं। यही कारण था कि डेमोग्राफी और डेमोक्रेसी को एक-दूसरे से जोड़ा जाने लगा। आलोचकों का तर्क था कि यदि बड़ी संख्या में बाहरी लोग मतदाता बन जाते हैं तो स्थानीय समुदायों का राजनीतिक प्रभाव कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर आईएमडीटी एक्ट के समर्थकों का कहना था कि असम में रहने वाले अनेक बंगाली भाषी मुसलमानों और गरीब नागरिकों को मनमाने ढंग से विदेशी घोषित किए जाने का खतरा था, इसलिए यह कानून मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी था।यह विवाद अंततः भारतीय सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने आईएमडीटी एक्ट को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह कानून अवैध घुसपैठ रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुआ और इसने विदेशी पहचान की प्रक्रिया को अत्यधिक कठिन बना दिया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि असम की जनसांख्यिकीय स्थिति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। इसके बाद असम में भी विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए फॉरेनर्स एक्ट के नियम लागू किए गए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को कई लोगों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ऐतिहासिक माना, जबकि कुछ मानवाधिकार संगठनों ने चिंता व्यक्त की कि इससे निर्दोष नागरिकों को परेशान किए जाने की संभावना सटीकता से बढ़ सकती है।
साथियों, अब वर्ष 2026 में केंद्र सरकार जिस मिशन डेमोग्राफी की बात कर रही है, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि कहीं न कहीं इसी ऐतिहासिक बहस से जुड़ी हुई दिखाई देती है। गृह मंत्रालय द्वारा गठित नई उच्चस्तरीय समिति का उद्देश्य केवल अवैध घुसपैठ की पहचान करना नहीं बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का वैज्ञानिक और साक्ष्य- आधारित अध्ययन करना बताया गया है। समिति की अध्यक्षता जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर को सौंपी गई है, जो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और मध्य प्रदेश के पूर्व लोकायुक्त रह चुके हैं। समिति में पूर्व नौकरशाह, पुलिस अधिकारी, आर्थिक विशेषज्ञ और जनगणना आयुक्त जैसे सदस्य शामिल किए गए हैं ताकि इस संवेदनशील विषय का बहुआयामी अध्ययन किया जा सके।समिति को जिन प्रमुख कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है, वे इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाते हैं। इसे अवैध आप्रवास सहित जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारणों का अध्ययन करना है। सीमा पार गतिविधियाँ, आर्थिक अवसर, नियोजित प्रवासन, असामान्य बसावट पैटर्न और सामाजिक- पर्यावरणीय कारकों की भूमिका का विश्लेषण करना है। समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर संरचनात्मक जनसंख्या परिवर्तनों का अध्ययन करेगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ आँकड़े राष्ट्रीय प्रवृत्तियों से अलग दिखाई देते हैं। साथ ही इसे अवैध आप्रवासियों की कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिए स्थायी संस्थागत ढाँचे की सिफारिश करने का कार्य भी सौंपा गया है।
साथियों सरकार की 3डी नीति,डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट—इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। डिटेक्ट का अर्थ है अवैध प्रवासियों की पहचान करना, डिलीट का अर्थ मतदाता सूची या सरकारी रिकॉर्ड से फर्जी नाम हटाना और डिपोर्ट का मतलब अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों को वापस भेजना। सरकार का दावा है कि यह अभियान केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है। सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, नकली दस्तावेज, आतंक वित्तपोषण, मानव तस्करी और संगठित अपराध जैसी गतिविधियों को इससे जोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि गृह मंत्री अमित शाह ने सभी सीमाओं पर 360 डिग्री प्लान लागू करने की बात कही है, जिसमें सीमा सुरक्षा बल, खुफिया एजेंसियाँ, केंद्रीय विभाग और राज्य सरकारें मिलकर काम करेंगी।हालाँकि इस पूरे मुद्दे का राजनीतिक आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वेस्ट बंगाल में चुनावों के दौरान बीजेपी ने अवैध घुसपैठ को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। पार्टी का आरोप रहा है कि सीमावर्ती इलाकों में अवैध प्रवास के कारण जनसंख्या संतुलन और चुनावी राजनीति प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार इस मुद्दे का राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए उपयोग करती है। आलोचकों का तर्क है कि जनसंख्या परिवर्तन केवल अवैध घुसपैठ का परिणाम नहीं होता; इसके पीछे रोजगार, शहरीकरण, आंतरिक पलायन, आर्थिक अवसर और सामाजिक गतिशीलता जैसे अनेक कारण भी होते हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले विस्तृत तथ्यात्मक अध्ययन आवश्यक है।इसी कारण नई समिति का गठन महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सरकार इसे साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण का आधार बता रही है। समिति को एक वर्ष के भीतर रिपोर्ट सौंपनी है और आवश्यकता पड़ने पर छह महीने का विस्तार भी दिया जा सकता है। माना जा रहा है कि रिपोर्ट के आधार पर सीमा प्रबंधन, नागरिक पहचान प्रणाली, जनसंख्या निगरानी और अवैध प्रवासियों की पहचान को लेकर बड़े प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।
साथियों, इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू मानवाधिकार और संवैधानिक संतुलन भी है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है जहाँ कानून का शासन सर्वोच्च माना जाता है। इसलिए किसी भी कार्रवाई में यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि वास्तविक भारतीय नागरिकों को परेशान न किया जाए और नागरिक अधिकारों का उल्लंघन न हो। यही कारण है कि विशेषज्ञ बार-बार कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। यदि किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किया जाता है तो उसके लिए पर्याप्त कानूनी प्रक्रिया, अपील का अधिकार और दस्तावेजी सत्यापन आवश्यक होगा।
साथियों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय परिवर्तन आज कई देशों के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं। यूरोप, अमेरिका और एशिया के अनेक देशों में सीमा सुरक्षा, अवैध आप्रवास और राष्ट्रीय पहचान को लेकर तीखी बहसें चल रही हैं। भारत में भी यही विमर्श अब अधिक संस्थागत और नीति-आधारित रूप लेता दिखाई दे रहा है। फर्क केवल इतना है कि भारत की स्थिति अत्यंत जटिल है, क्योंकि यहाँ विविध भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ और सीमाई चुनौतियाँ एक साथ मौजूद हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि मिशन डेमोग्राफी केवल अवैध घुसपैठ के विरुद्ध अभियान नहीं बल्कि भारत के भविष्य की सामाजिक, राजनीतिक और सुरक्षा संरचना से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक संतुलन की रक्षा के लिए आवश्यक कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष आशंका व्यक्त करता है कि इस मुद्दे का राजनीतिक और सांप्रदायिक उपयोग हो सकता है। आईएमडीटी एक्ट से लेकर आज की हाई-लेवल कमेटी तक की यात्रा यह दिखाती है कि भारत में जनसांख्यिकीय परिवर्तन का प्रश्न केवल आँकड़ों का विषय नहीं बल्कि संविधान, नागरिकता, मानवाधिकार, लोकतंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा के जटिल संतुलन से जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में समिति की रिपोर्ट और उसके आधार पर उठाए जाने वाले कदम यह तय करेंगे कि भारत इस चुनौती का समाधान किस दिशा में खोजता है।

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