किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी होती है। युवा केवल भविष्य के निर्माता नहीं होते, बल्कि वर्तमान के परिवर्तनकारी वाहक भी होते हैं। इसलिए जब युवाओं की आशाओं, संघर्षों और सपनों पर प्रश्नचिह्न लगने लगें, तो यह केवल एक पीढ़ी की चिंता नहीं रहती, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य का विषय बन जाती है।आज देश का युवा, किसान, मजदूर, गरीब, पिछड़ा और मध्यम वर्ग एक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछ रहा है क्या उसकी आवाज़ वास्तव में सुनी जा रही है?भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक सभी नागरिकों को समानता, सम्मान और अवसर का अधिकार प्रदान किया गया है। संविधान की मूल भावना यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के न्याय और समान अवसर प्राप्त हों। लोकतंत्र की सफलता भी इसी पर निर्भर करती है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसकी आवाज़ पहुँचे और उसे सुना जाए।वर्तमान समय में लाखों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। वे अपने परिवारों और देश के बेहतर भविष्य का सपना देखते हैं। किंतु जब परीक्षा संबंधी अनियमितताओं, पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में विलंब तथा प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं, तब उनके मन में स्वाभाविक रूप से निराशा और असुरक्षा का भाव उत्पन्न होता है। यह केवल रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि विश्वास का प्रश्न भी है।
इसी प्रकार किसान, जो राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का आधार हैं, और मजदूर, जो विकास की इमारत के वास्तविक निर्माता हैं, वे भी सम्मान, सुरक्षा और न्यायपूर्ण अवसरों की अपेक्षा रखते हैं। जब समाज के परिश्रमी वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगें, तब लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर पड़ने लगता है।
यह स्थिति किसी एक वर्ग की समस्या नहीं है। यह राष्ट्र निर्माण से जुड़ा हुआ विषय है। जिस देश का युवा निराश होगा, जिस किसान की मुस्कान फीकी होगी और जिस मजदूर को सम्मान नहीं मिलेगा, वहाँ विकास की गति भी सीमित हो जाएगी। समृद्धि तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचे।
भारत को एक सशक्त, समावेशी और विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आवश्यक है कि शासन और प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। अवसरों की समानता, न्याय की सुलभता और भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहिष्णुता ही नागरिकों के विश्वास को मजबूत कर सकती है।अब आवश्यकता है कि युवा शक्ति की आकांक्षाओं को समझा जाए, किसानों की पीड़ा को महसूस किया जाए, मजदूरों के सम्मान की रक्षा की जाए और समाज के वंचित वर्गों को न्याय दिलाने के लिए ठोस प्रयास किए जाएँ। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता में नहीं, बल्कि जागरूक, सम्मानित और सहभागी नागरिकों में निहित होती है।याद रहे “जब युवा जागता है तो इतिहास बदलता है, जब किसान मुस्कुराता है तो राष्ट्र समृद्ध होता है, और जब न्याय सशक्त होता है तो लोकतंत्र अमर हो जाता है।”आइए, ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें जहाँ अवसर पर किसी का एकाधिकार न हो, न्याय किसी की पहुँच से बाहर न हो और प्रत्येक नागरिक सम्मान,समानता तथा मानवता के साथ जीवन जी सके।
करुणा हमारी संस्कृति बने, समानता हमारी शक्ति बने, न्याय हमारी पहचान बने और राष्ट्रहित हमारा सर्वोच्च धर्म बने।
चिंतक/ मेंटर/ एक्टिविस्ट/ दिल्ली विश्वविद्यालय












