सभी धर्मों के लोगों को साथ लेकर चलने से ही देश आगे बढ़ेगा।
अनिल कुमार गुप्ता दिल्ली
बातचीत बंद होने से गलतफहमी पैदा हुई, विद्वानों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज को आगे आकर लोगों का मार्गदर्शन करना चाहिएः प्रो. शाहिद अख्तर
नई दिल्लीः
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग के सदस्य प्रोफेसर शाहिद अख्तर ने देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए बातचीत के महत्व पर जोर दिया और कहा कि सभी समस्याओं का समाधान बातचीत और चर्चा के माध्यम से ही किया जा सकता है। इसलिए, संगठनों के साथ चर्चा शुरू की गई। उन्होंने कहा कि सभी को साथ लेकर चलने से ही देश आगे बढ़ेगा। क्योंकि हमारे देश की सुंदरता एकता और विविधता में निहित है, इसलिए हमें अपनी सभ्यता को संरक्षित करना होगा। इस संबंध में मैंने एक पुस्तक भी लिखी है जो सांप्रदायिक सद्भाव, एकता, संवाद और कमियों के बारे में बात करती है। यह देश न केवल सभी धर्मों की रक्षा करता है बल्कि सभी को सुरक्षा भी प्रदान करता है।
उन्होंने बार-बार कहा कि हमें अपने भीतर की खामियों को दूर करना होगा और हम शिक्षा, नैतिकता के पालन के माध्यम से ही दुष्टों को हरा सकते हैं। उन्होंने कहा कि संवाद की कमी के कारण कुछ गलतफहमी पैदा हुई है, अब उन्हें कौन दूर करेगा, अगर हम शिक्षित हैं, तो हम कमियों को भी दूर कर सकते हैं। ऐसे में विद्वानों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज को इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि धार्मिक शिक्षा एक अच्छा इंसान बना सकती है और सांसारिक शिक्षा हमें प्रगति के पथ पर ले जा सकती है। हमारा प्रयास इस देश में शांति और भाईचारे को बनाए रखने का होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि वास्तव में, बातचीत के दरवाजे बंद होने के कारण समस्याएं पैदा हो गई हैं, इस्लाम भी कहता है कि किसी भी पड़ोसी को भूखा सोने न दें, पैगंबर इस्लाम (स. अ. व. व.) ने यहां तक कहा कि अगर शांति बनाने में आप सम्मान कम होता हैं तो क़ियामत के दिन, मुझसे वह सम्मान ले लेना मगर सुलह कर लेना
जाहिर है, हममें कुछ खामियां हैं और हमने खुद को धर्म से दूर कर लिया है। मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि खुदा ने मुझे मुसलमान बनाया और मुझे इस देश में पैदा किया , अब यह मेरा कर्तव्य है कि मैं इस महान देश की सेवा करूं और जरूरत पड़ने पर बलिदान करने के लिए तैयार रहूं। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को किसी एक दल का बंधुआ मजदूर नहीं रहना चाहिए बल्कि अपनी राजनीतिक स्थिति को भी मजबूत करना चाहिए। जब हमारी राजनीतिक स्थिति मजबूत होगी, तो हमारे महत्व का भी आकलन किया जाएगा। इसलिए, मैं विद्वानों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज से अपील करता हूं कि वे इस दिशा में लोगों का मार्गदर्शन करें।












