दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्ट्स फैकल्टी परिसर में गुरुवार को आयोजित “समता दिवस” कार्यक्रम के दौरान मशहूर इतिहासकार एस. इरफान हबीब पर हमला किए जाने की घटना सामने आई है। यह घटना ‘पीपुल्स लिटरेचर फेस्टिवल’ के दौरान हुई, जिसे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने आयोजित किया था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब प्रो. हबीब मंच से भाषण दे रहे थे, तभी कुछ अज्ञात लोगों ने स्टेज के पीछे से उन पर पानी से भरी बाल्टी और एक डस्टबिन फेंक दिया। बाल्टी छात्रों के बीच गिर गई, जबकि प्रो. हबीब को शारीरिक चोट नहीं आई। इसके बावजूद उन्होंने अपना भाषण जारी रखा। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
इस हमले की पुष्टि स्वयं प्रो. हबीब ने भी की है। उन्होंने समर्थन जताने वालों का धन्यवाद करते हुए कहा कि विचारों पर हमला लोकतांत्रिक परंपरा के विरुद्ध है।
राजनीतिक और अकादमिक जगत की प्रतिक्रिया
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के महासचिव डी. राजा ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि यह बहस या असहमति नहीं, बल्कि डराने-धमकाने की कायरतापूर्ण कोशिश है। उनके अनुसार, विचारों का मुकाबला विचारों से होना चाहिए, न कि हिंसा या गुंडागर्दी से।
इतिहासकार रुचिका शर्मा ने भी इसे शर्मनाक बताते हुए कहा कि केवल अपने विचार रखने के कारण किसी विद्वान पर हमला किया जाना शिक्षा और लोकतांत्रिक वातावरण के लिए गंभीर खतरा है। साहित्यकार और शिक्षाविद अपूर्वानंद ने इसे “बुद्धिजीवियों को चुप कराने की कोशिश” बताया।
आरोप-प्रत्यारोप और जांच
कुछ रिपोर्टों में आयोजक संगठन AISA ने आरोप लगाया है कि हमला दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े तत्वों द्वारा संगठित रूप से किया गया। हालांकि, इस संबंध में अभी तक पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है। जांच की संभावना जताई जा रही है।
प्रगतिशील लेखक संघ की निंदा
अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) ने भी घटना की तीखी निंदा करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में इस तरह की हिंसा अस्वीकार्य है और यह लोकतांत्रिक मूल्यों तथा विचारों की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। संगठन ने प्रो. हबीब और कार्यक्रम आयोजकों के साथ एकजुटता व्यक्त की है तथा सभी प्रगतिशील संगठनों से ऐसे कृत्यों के खिलाफ आवाज़ उठाने का आह्वान किया है।
व्यापक संदर्भ
प्रो. एस. इरफान हबीब भारतीय इतिहास के प्रमुख विद्वानों में माने जाते हैं और मार्क्सवादी दृष्टिकोण से इतिहास-लेखन के लिए जाने जाते हैं। यह घटना विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ते वैचारिक तनाव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उठते सवालों को फिर से केंद्र में ले आई है।
छात्र संगठनों और बुद्धिजीवियों ने मांग की है कि विश्वविद्यालयों में सुरक्षित, खुली और निर्भीक बहस का माहौल सुनिश्चित किया जाए।












