October 17, 2026 10:00 pm

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एफ़एसएस एआई क़ा चला बड़ा डंडा एक्शन पार्ट-2-भ्रामक फ़ूड लेबलिंग पर कसता शिकंजा: क्या फ्रेश,प्योर,नेचुरल हेल्दी और ज़ीरो शुगर के दावों का युग अब समाप्त होने जा रहा है? -समग्र व्यापक विश्लेषण

6 जुलाई की कार्रवाई के ठीक दो दिन बाद, 8 जुलाई 2026 को एफ़एसएसएआई क़ा बड़ा एक्शन पार्ट-2

स्वस्थ भारत क़े निर्माण हेतु कठोर कानूनों क़े साथ सरकार की सतर्कता,नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता, उद्योग जगत की ईमानदारी और सबसे बढ़कर जागरूक उपभोक्ता की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

गोंदिया -वैश्विक स्तरपर आज का उपभोक्ता केवलभोजन नहीं खरीदता,बल्कि स्वास्थ्य विश्वास और जीवनशैली भी खरीदता है।यही कारण है कि खाद्य उद्योग ने अपने उत्पादों पर फ्रेश,हेल्दी,प्योर,नेचुरल,100 प्रतिशत आर्गेनिक,ज़ीरो शुगर,नों एडेड शुगर, इम्युनिटी बूस्टर और होलसमथिंग जैसे आकर्षक शब्दों का व्यापक उपयोग शुरू कर दिया है। एफ़एसएस एआई ने भ्रामक विज्ञापनों और गलत लेबलिंग के खिलाफ अपने देशव्यापी अभियान का विस्तार कर दिया है। 6 जुलाई की कार्रवाई के ठीक दो दिन बाद,यानी 8 जुलाई 2026 को एफ़एसएस एआई ने बड़ा एक्शन पार्ट-2 लिया है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर आधिकारिक घोषणा करते हुए देश के तीन अन्य बड़े ब्रांडों को कारण बताओ (शो-कॉज ) नोटिस जारी किया है।इन शब्दों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव इतना गहरा होता है कि अधिकांश ग्राहक पैकेट के सामने लिखे दावों को ही अंतिम सत्य मान लेते हैं और पीछे दिए गए वास्तविक तथ्यों को पढ़ने की आवश्यकता भी नहीं समझते।परिणाम स्वरूप,उपभोक्ता कई बार ऐसे उत्पाद खरीद लेते हैं जो वास्तव में उतने स्वास्थ्य वर्धक नहीं होते जितना उनका प्रचार किया जाता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी,गोंदिया,महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते आम जनता को यह जानकारी देना चाहूंगा कि अब भारत में इस प्रवृत्ति पर निर्णायक कार्रवाई की शुरुआत दिखाई दे रही है।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफ़एसएस एआई ) ने कई कंपनियों को उनके भ्रामक दावों के संबंध में नोटिस जारी कर सात दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। यह केवल कुछ कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे खाद्य उद्योग के लिए स्पष्ट संदेश है कि अब बिना वैज्ञानिक प्रमाण के किए गए स्वास्थ्य संबंधी दावों को सटीकता से स्वीकार नहीं किया जाएगा।
साथियों, भारत में खाद्य सुरक्षा का पूरा कानूनी ढांचाखाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 पर आधारित है, जिसने पहले से लागू अनेक अलग- अलग खाद्यकानूनों को एकीकृत कर आधुनिक और वैज्ञानिक व्यवस्था प्रदान की। इस अधिनियम की धारा 24 विशेष रूप से भ्रामक विज्ञापनों और गलत दावों पर रोक लगाती है। कोई भी निर्माता, विक्रेता या कंपनी ऐसा विज्ञापन प्रकाशित नहीं कर सकती जो उत्पाद की गुणवत्ता,प्रकृति,संरचना या स्वास्थ्य संबंधी लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करे अथवा उपभोक्ता को भ्रमित करे। यही कारण है कि यदि कोई कंपनी 100 प्रतिशत प्राकृतिक या पूर्णतः शुद्ध लिखती है तो उसे यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध करना होगा कि उसका दावा वस्तुतः सही है।इसी उद्देश्य से एफएसएसएआई (विज्ञापन एवं दावे) विनियम, 2018 लागू किए गए। इन विनियमों ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक स्वास्थ्य दावा, पोषण दावा अथवा गुणवत्ता संबंधी दावा वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। विशेष रूप से अनुसूची-5 में नेचुरल, फ्रेश,प्योर,ओरिजिनल तथा ट्रेडिशनल जैसे शब्दों के उपयोग के लिए अत्यंत कठोर मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इन मानकों के अनुसार अधिकांश प्रसंस्कृत (प्रोसेसड) खाद्य पदार्थ वास्तव में नेचुरल अथवा फ्रेश कहलाने की पात्रता ही नहीं रखते। अर्थात केवल विपणन (मार्केटिंग) के उद्देश्य से इन शब्दों का उपयोग करना कानून का उल्लंघन माना जा सकता है।
साथियों,आज सबसे अधिक भ्रम ज़ीरो शुगर और नों एडेड शुगर जैसे शब्दों को लेकर है। सामान्य उपभोक्ता दोनों को समान समझता है,जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से दोनों का अर्थ अलग-अलग है। नों एडेड शुगर का अर्थ केवल इतना है कि निर्माण प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त चीनी नहीं मिलाई गई। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्पाद में प्राकृतिक शर्करा या अन्य प्रकार की शर्करा मौजूद नहीं है। कई कंपनियां सुक्रोज,माल्टोडेक्सट्रिन, हाई- फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप,डेक्सट्रोज, इनवर्ट शुगर,कॉन्सन्ट्रेटेड फ्रूट जूस अथवा अन्य कार्बोहाइड्रेट स्रोतों का उपयोग करती हैं, जो शरीर में जाकर अंततः ग्लूकोज में परिवर्तित होते हैं। इसलिए केवल पैकेट के सामने लिखे आकर्षक दावे पर विश्वास करना उपभोक्ता के लिए सटीकता से जोखिमपूर्ण हो सकता है।
साथियों भारतीय कानून केवल खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है।उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के अंतर्गत गठित केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण को भी भ्रामक विज्ञापनों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है। यह संस्था स्वतः संज्ञान लेकर कंपनियों पर भारी आर्थिक दंड लगा सकती है, विज्ञापन वापस लेने का आदेश दे सकती है तथा आवश्यक होने पर ऐसे प्रचार में शामिल प्रसिद्ध व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगा सकती है। इस प्रकार एफएसएसएआई और सीसीपीए मिलकर उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और आर्थिक हितों की दोहरी सुरक्षा प्रदान करते हैं।भारत की संघीय व्यवस्था में कानून केंद्र बनाता है,किंतु उसका वास्तविक क्रियान्वयन राज्यों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राज्य में खाद्य सुरक्षा आयुक्त नियुक्त होते हैं, जिनके अधीन नामित अधिकारी और खाद्य सुरक्षा अधिकारी कार्य करते हैं।यहीअधिकारी खाद्य प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करते हैं,नमूने लेते हैं,प्रयोगशाला परीक्षण कराते हैं, उल्लंघन पाए जाने पर उत्पाद जब्त करते हैं तथा न्यायालयों में अभियोजन चलाते हैं। यदि किसी कंपनी का उत्तर असंतोषजनक पाया जाता है तो उसका लाइसेंस निलंबित या रद्द भी किया जा सकता है। इस प्रकार केंद्रीय नियमों का वास्तविक प्रभाव राज्य स्तर के प्रभावी प्रवर्तन पर निर्भर करता है।
साथियों, वर्तमान कार्रवाई केवल कुछ कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय खाद्य उद्योग के लिए एक व्यापक चेतावनी है कि भविष्य में बिना वैज्ञानिक आधार के किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी दावे स्वीकार नहीं किए जाएंगे।यदि किसी उत्पाद कोइम्युनिटी बूस्टर, हार्ट हेल्दी,डायबिटिक फ्रेंडली अथवा पूर्णतः प्राकृतिक कहा जाता है, तो निर्माता को उसके समर्थन में वैज्ञानिक अनुसंधान, परीक्षण तथा प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। केवल विपणन की भाषा अब पर्याप्त नहीं होगी।उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वे सही उत्पाद की पहचान कैसे करें। किसी भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ को खरीदते समय केवल सामने लिखे दावों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले पीछे दी गई इंग्रेडिट्स लिस्ट को पढ़ना चाहिए। कानून के अनुसार सामग्री घटते क्रम में लिखी जाती है। यदि किसी तथाकथित हेल्दी बिस्कुट में सबसे पहले मैदा और दूसरे स्थान पर चीनी लिखी है, तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि वही उसकी प्रमुख सामग्री है।इसी प्रकार पोषण संबंधी तालिका में प्रति 100 ग्राम चीनी, सोडियम, संतृप्त वसा और ऊर्जा की मात्रा देखनी चाहिए। कंपनियां कई बार बहुत छोटे सर्विग साइज का उपयोग करके वास्तविक मात्रा कम दिखाई देती हैं।इसलिए प्रति 100 ग्राम का कॉलम ही सही तुलना का सटीक आधार होता है।
साथियों, प्रत्येक उपभोक्ता को उत्पाद पर अंकित 14 अंकों का एफएसएसएआई लाइसेंस नंबर अवश्य देखना चाहिए। यही नंबर बताता है कि उत्पाद अधिकृत इकाई द्वारा निर्मित है। आवश्यकता पड़ने पर इस लाइसेंस नंबर का सत्यापन भी किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त निर्माण तिथि समाप्ति तिथि,शाकाहारी अथवा मांसाहारी चिह्न एलर्जी संबंधी चेतावनी तथा भंडारण संबंधी निर्देशों को भी गंभीरता से पढ़ना चाहिए।
साथियों, भारत ने भी अपने नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित किया है। हालांकि अभी भी एक महत्वपूर्ण सुधार शेष है,फ्रंट- ऑफ-पैक लेबलिंग अनेक विशेषज्ञ वर्षों से सुझाव दे रहे हैं कि जिन खाद्य पदार्थों में अत्यधिक चीनी, नमक या संतृप्त वसा हो, उनके पैकेट के सामने ही स्पष्ट चेतावनी अंकित की जाए। इससे उपभोक्ता बिना पूरा पैकेट पढ़े भी जोखिम का प्रारंभिक आकलन कर सकेगा। विश्व के अनेक देशों में ऐसी प्रणाली सफल सिद्ध हुई है और भारत में भी इसे शीघ्र लागू करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।वर्तमान समय में खाद्य उद्योग केवल स्वाद नहीं बेच रहा, बल्कि स्वास्थ्य की छवि भी बेच रहा है। उपभोक्ता का मनोविज्ञान इस प्रकार प्रभावित किया जाता है कि वह चमकीले रंग, आकर्षक पैकेजिंग और स्वास्थ्य संबंधी दावों के आधार पर निर्णय लेने लगता है। यही कारण है कि आधुनिक उपभोक्ता के लिए वैज्ञानिक जागरूकता उतनी ही आवश्यक है जितनी कानूनी सुरक्षा।यदि उपभोक्ता स्वयं सामग्री सूची,पोषण तालिका और लाइसेंस विवरण पढ़ने की आदत विकसित कर ले, तो भ्रामक विपणन का प्रभाव स्वतःकम हो जाएगा।एफएस एसएआई द्वारा हाल में जारी नोटिस भारतीय खाद्य विनियमन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत हैं। इससे स्पष्ट संदेश गया है कि केवल विपणन की भाषा के सहारे उपभोक्ताओं को प्रभावित करने की संस्कृति अब स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कदम ईमानदार कंपनियों के लिए भी लाभकारी है, क्योंकि इससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा और गुणवत्ता आधारित बाजार सटीकता से विकसित होगा।
साथियों, विश्व स्तरपर भी भ्रामक खाद्य लेबलिंग एक गंभीर चिंता का विषय है। संयुक्त राष्ट्र के कोडेक्स एलिमेंटेरिय ने स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं कि किसी भी खाद्य उत्पाद पर किया गया दावा वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित होना चाहिए तथा उपभोक्ता को भ्रमित नहीं करना चाहिए। यही वैश्विक मानक अधिकांश देशों की नीतियों का आधार है।यूरोपीय संघ ने इस क्षेत्र में विश्व का सबसे कठोर ढांचा विकसित किया है। वहां केवल वही स्वास्थ्य अथवा पोषण संबंधी दावे स्वीकार किए जाते हैं जिन्हें यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण द्वारा वैज्ञानिक रूपसेअनुमोदित किया गया हो। नेचुरल, हेल्दी अथवा प्योर जैसे सामान्य दावों का मनमाना उपयोग लगभग असंभव है। यदि दावा स्वीकृत सूची में नहीं है तो उसे पैकेट पर लिखना ही प्रतिबंधित है। इस कारण यूरोपीय उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी जानकारी उपलब्ध होती है।संयुक्त राज्य अमेरिका में एफडीए और एफ़टीसी मिलकर इस व्यवस्था का संचालन करते हैं। एफडीए खाद्य लेबलों की वैज्ञानिक सत्यता की जांच करता है, जबकि एफ़टीसी भ्रामक विज्ञापनों पर आर्थिक दंड लगाता है। अनेक स्वास्थ्य संबंधी दावों के साथ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक होता है कि संबंधित दावा सरकारी वैज्ञानिक प्रमाणन के अंतर्गत स्वीकृत नहीं है। इससे उपभोक्ता को भ्रमित होने की संभावना कम होती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि स्वस्थ भारत का निर्माण केवल कठोर कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए सरकार की सतर्कता नियामक संस्थाओं की निष्पक्षता उद्योग जगत की ईमानदारी और सबसे बढ़कर जागरूक उपभोक्ता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। जब उपभोक्ता पैकेट के सामने लिखे आकर्षक शब्दों के बजाय पीछे छिपे वैज्ञानिक तथ्यों को पढ़ना शुरू करेगा,तभी फ्रेश,प्योर, नेचुरल हेल्दी और ज़ीरो शुगर जैसे शब्द वास्तविक अर्थों में विश्वसनीय बन सकेंगे। यही उपभोक्ता अधिकारों की वास्तविक विजय होगी और यही आधुनिक खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य भी है।

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