प्रकृति के संकेत और इंसान का घमंड । डॉ विक्रम चौरसिया
कभी कोरोना जैसी महामारी, कभी भूकंप और बाढ़, कभी भयानक आग, कभी विमान दुर्घटना और कभी नेपाल जैसी हृदयविदारक प्राकृतिक त्रासदी प्रकृति समय-समय पर इंसान को झकझोरकर कुछ समझाने का प्रयास करती है। लेकिन शायद इंसान अपने घमंड, स्वार्थ और भाग-दौड़ में उन संकेतों को समझना ही नहीं चाहता।एक पल में जिंदगी बदल जाती है। जो व्यक्ति सुबह अपने परिवार के साथ हँस रहा होता है, जरूरी नहीं कि शाम तक उसी दुनिया में हो। कौन-सा पल किसके जीवन में क्या लिख दे कोई नहीं जानता।
फिर भी इंसान धन, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति के घमंड में जीता है। कोई छल करता है, कोई कपट, कोई झूठ और मक्कारी; कोई ईर्ष्या और जलन में स्वयं को जलाता है, तो कोई अपने स्वार्थ के लिए दूसरे का जीवन कठिन बना देता है।लेकिन सच बहुत सरल है
आज कोई आगे है, कल कोई पीछे होगा।आज कोई चला गया, कल हमारी बारी भी आएगी।अंततः सभी को मिट्टी में ही मिल जाना है कोई पहले, कोई बाद में।फिर यह घमंड किस बात का?
नेपाल की त्रासदी हमें केवल दुःखी नहीं करती, बल्कि चेताती भी है कि इंसान अपने जीवन और प्रकृति दोनों को समझे। विकास की दौड़ में प्रकृति का सम्मान करना सीखे और जीवन की दौड़ में इंसानियत को पीछे न छोड़े।आइए, थोड़ा कम छल करें, थोड़ा कम नफरत करें, थोड़ा कम ईर्ष्या करें और थोड़ा अधिक प्रेम बाँटें। किसी को गिराने के बजाय उठाएँ, किसी के आँसू का कारण बनने के बजाय सहारा बनें।ईश्वर सभी को सुरक्षित रखे और जो हमारे बीच नहीं रहे, उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा उनके परिवारों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दे।क्योंकि जब सब कुछ समाप्त हो जाएगा, तब न धन साथ जाएगा, न पद और न प्रतिष्ठा।साथ रह जाएगी केवल हमारी इंसानियत और लोगों की वह याद कि हमने किसी के जीवन में दर्द दिया था या मुस्कान।
जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए घमंड नहीं करुणा चुनिए स्वार्थ नहीं मानवता चुनिए। क्योंकि अंत में हमारी सबसे बड़ी पहचान यही होगी कि हम कितने बड़े इंसान थे।












