शिक्षक की गोद में प्रलय और सृजन दोनों पलते हैं।यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि शिक्षक की उस विराट भूमिका का परिचय है, जो एक विद्यार्थी के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के भविष्य को आकार देती है।आज शिक्षक दिवस है। यह दिन केवल गुरु जी को शुभकामनाएँ देने का अवसर नहीं, बल्कि उस रिश्ते को महसूस करने का दिन है, जिसने सदियों से हमारी सभ्यता को दिशा दी है गुरु और शिष्य का रिश्ता।गुरुकुल की परंपरा से शुरू हुई शिक्षा की यात्रा आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, स्मार्ट कक्षाओं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक पहुँच चुकी है। साधन बदले, तकनीक बदली और सीखने-सिखाने के तरीके बदले, लेकिन शिक्षा का मूल उद्देश्य आज भी वही है मनुष्य को ज्ञानवान ही नहीं, विवेकवान और संस्कारवान बनाना।आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में हमारे प्रश्नों के उत्तर दे सकती है। दुनिया भर की जानकारी हमारी हथेली पर उपलब्ध है। ऐसे समय में एक प्रश्न स्वाभाविक है क्या मशीन कभी गुरु जी का स्थान ले सकती है?शायद नहीं।क्योंकि मशीन सूचना दे सकती है, संस्कार नहीं।वह उत्तर दे सकती है, विवेक नहीं।वह रास्ते बता सकती है, लेकिन जीवन की दिशा नहीं।
एक सच्चा शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं करते, वह विद्यार्थी के भीतर जिज्ञासा जगातेहै, प्रश्न करने का साहस देते है और सही-गलत के बीच निर्णय लेने की क्षमता विकसित करते है। वह असफलता में हौसला देते है, कमजोरी में हाथ थामते है और सफलता के क्षण में स्वयं पीछे खड़ा होकर विद्यार्थी की उपलब्धि में अपना सुख खोजते है।यही शिक्षक की असली पहचान है।
आज के प्रतिस्पर्धी दौर में विद्यार्थी सफलता के दबाव से गुजर रहा है, वहीं शिक्षक के सामने बदलती दुनिया के साथ स्वयं को निरंतर बदलने की चुनौती है। ऐसे समय में यह समझना भी जरूरी है कि सच्चा शिक्षक और सच्चा विद्यार्थी कौन है।सच्चा शिक्षक वह है, जो विद्यार्थी को अपने जैसा नहीं, बल्कि स्वयं से बेहतर बनने की प्रेरणा दे।और सच्चा विद्यार्थी वह है, जो गुरु की सीख को केवल स्मृति में नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारे।शिक्षा की खूबसूरती यह भी है कि इसमें सीखने की कोई उम्र नहीं होती। कभी शिक्षक विद्यार्थी का हाथ पकड़कर अक्षर लिखना सीखते हैं तो कभी वही विद्यार्थी अपने शिक्षक को नई तकनीक से परिचित करा सकता है। यही पीढ़ियों के बीच ज्ञान का सुंदर संवाद है।कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले समय में शिक्षा को और बदल सकती है, लेकिन वह उस मानवीय स्पर्श की जगह नहीं ले सकती जिसकी जरूरत जीवन के कठिन मोड़ पर होती है। जब कोई विद्यार्थी असफल होकर टूटता है, अपने निर्णय पर संदेह करता है या आगे बढ़ने के लिए केवल एक भरोसेमंद आवाज की तलाश करता है, तब उसे किसी तकनीक से अधिक आवश्यकता होती है एक शिक्षक के विश्वास की।क्योंकि शिक्षक केवल यह नहीं बताते कि क्या जानना है; वह यह भी सिखाते है कि उस ज्ञान के साथ कैसे जीना है।एक शिक्षक की कही हुई एक छोटी-सी बात किसी विद्यार्थी की पूरी जिंदगी बदल सकती है। वही विद्यार्थी आगे चलकर डॉक्टर, वैज्ञानिक, प्रशासक, शिक्षक, उद्यमी या समाज का जिम्मेदार नागरिक बनता है। इस अर्थ में शिक्षक केवल कक्षा नहीं बनाते वह आने वाले समाज का चरित्र भी गढ़ते है।इसीलिए शिक्षक का सम्मान किसी एक दिन की औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन भर साथ रहने वाला संस्कार होना चाहिए।गुरुकुल से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक शिक्षा का सफर आगे भी चलता रहेगा। तकनीक बदलती रहेगी, साधन बदलते रहेंगे और पीढ़ियाँ भी बदलती रहेंगी। लेकिन जब तक मनुष्य में सीखने की जिज्ञासा और किसी दूसरे को सही दिशा देने की आवश्यकता रहेगी, गुरु-शिष्य का रिश्ता जीवित रहेगा।
क्योंकि अंततः राष्ट्र का भविष्य केवल आधुनिक तकनीक से नहीं, चरित्रवान मनुष्यों से बनता है और उन मनुष्यों के निर्माण में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।उन सभी गुरुओं को सादर नमन, जिन्होंने हमें केवल पढ़ना नहीं सिखाया, बल्कि सोचना, संघर्ष करना, असफलताओं से सीखना और सही रास्ते पर चलना सिखाया।शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। चिंतक/ मेंटर एक्टिविस्ट/दिल्ली विश्वविद्यालय 9069821319










