November 6, 2026 4:36 am

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प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, किसानों और श्रमिकों के रहनुमा थे, वीर बसावन सिंह

7 अप्रैल पुण्यतिथि पर विशेष

प्रस्तुति अनमोल कुमार

पटना। ब्रिटिश सरकार के समय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रुप में 18 साल तक कारागार में कैद रहे बसावन सिंह। इन्होंने योगेन्द्र शुक्ल के साथ मिलकर बिहार कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया, जिसके संस्थापक सदस्य बने रहे। बर्ष – 2000 में भारत सरकार ने इस विभूति के संस्मरण में डाक टिकट जारी किया। लम्बे कद के प्रतिभावान व्यक्तित्व के धनी थे, बसावन सिंह। स्वतंत्रता सेनानी के साथ वंचितों, औद्योगिक एवं कृषि श्रमिकों के अधिकार के लिए निरंतर संघर्षरत रहे। इनका जन्म हाजीपुर जिले के जमालपुर ग्राम के भूमिहार परिवार में 23 मार्च, 1909 में हुआ था। 8 बर्ष की आयु में ही पिता का छाया इनके उपर से हट गया। 10 साल की उम्र में महात्मा गॉंधी को देखने और सुनने वे हाजीपुर गए, उसी समय से उनके मन मष्तिष्क में देश की आज़ादी के लिए आग सुलगने लगा। 1926 में गाँव छोड़कर पटना स्थित सदाकत आश्रम और बिहार विद्यापीठ में रहकर सैन्य संचालन का कार्यभार संभाला। लाहौर षड्यंत्र के दौरान 1929 में वे फरार हो गये। चन्द्रशेखर आजाद और केशव चक्रवर्ती के साथ 1930 में 30 दिनों तक बांकीपुर जेल में रहे। 1937 में जयप्रकाश नारायण और रामबृक्ष बेनीपुरी के साथ 18 माह तक जेल में रहे। 1940 में सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर अंग्रेज भारत जोडों आन्दोलन डटकर भाग लिया। श्रीकृष्ण सिंह तत्कालीन मुख्यमंत्री के काल में श्री सिंह, उद्योग मंत्री थे। मजदूरों की बदहाली देखकर इन्होंने मंत्री पद त्याग कर मजदूरों को हक और अधिकार दिलाने के लिए श्रमिक आंदोलन को अपनाया। 1936 से 1989 तक श्रमिक संघ में आन्दोलनरत रहे। इस दौरान वे हिन्द मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। कोयला, रेलवे, चीनी, सिमेन्ट, अबरख और खेतिहर मजदूर के हित के लिए हमेशा लड़ते रहे। डालमिया में मजदूरों की मांग को लेकर 30 दिनों तक आमरण अनशन पर रहे। इनकी धर्मपत्नी, कमला सिन्हा ने भी इनके पदचिह्न पर चलकर श्रमिक आंदोलन को आगे बढ़या। हिन्द मजदूर सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। राज्यसभा के सदस्य रही और गुजराल सरकार में विदेश राज्य मंत्री भी रही। बसावन बाबू के सानिध्य में मुझे ( अनमोल कुमार) को रहने अवसर मिला। उन्होंने मुझे बिहार के औद्योगिक श्रमिक आंदोलन पर पी, एच, डी, करने का मशबीरा दिया और कहा कि तुम दो घंटे समय रोज दो, मुझे सुनो और लिखों, पी एच डी पूरा हो जाएगा। मैं पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ राम उद्गार महतो के मार्गदर्शन में अपना पंजीकरण कराकर काम शुरू कर दिया। परन्तु दुर्भाग्य वस 7 अप्रैल, 1989 बसावन सिंह का स्वर्गवास हो गया। मेरा पी एच डी का सपना भी चूर चूर हो गया। उनके निधन पर सारा राष्ट्र शोकाकुल हो गया था।*घर घर में चमन बसाने वाला, वीर बसावन जिन्दाबाद!

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