रोहित कुमार गुप्ता उतरौला (बलरामपुर)
ग्रामीण क्षेत्रों में शादियों का स्वरूप तेजी से बदलता जा रहा है। हल्दी रस्म और मेहंदी रस्म, जो कभी एक पारंपरिक और सादगीपूर्ण परंपरा मानी जाती थीं, अब एक बड़े दिखावे और फिजूलखर्ची का रूप लेती जा रही हैं। यह दोनों रस्में अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी हैं, जहां यह न केवल पारंपरिक भावना से हट कर हो रही हैं, बल्कि इन्हें निभाने के लिए परिवारों पर आर्थिक बोझ भी डाला जा रहा है।
हल्दी रश्म
वर्ष 2020 से पहले तक हल्दी रस्म का आयोजन घरेलू स्तर पर और बिना किसी दिखावे के किया जाता था। हल्दी, चंदन, आटा, बेसन, दूध और अन्य घरेलू सामग्री का उबटन दूल्हा-दुल्हन की त्वचा को निखारने के लिए किया जाता था। यह एक पारंपरिक रस्म थी जो सादगी और स्वाभाविकता से संपन्न होती थी। लेकिन हाल के वर्षों में यह रस्म एक महंगे आयोजन में बदल गई है, जिसमें हजारों रुपये खर्च कर डेकोरेशन, पीले वस्त्र, महंगे फूलों की सजावट, DJ और फोटोशूट आयोजित किए जाते हैं। इस बदलाव ने न केवल दिखावे को बढ़ावा दिया है, बल्कि ग्रामीण परिवारों पर वित्तीय दबाव भी डाला है।
मेहदी रस्म
इसके साथ ही, मेहदी रस्म का प्रचलन भी अब सादगी और पारंपरिक ढंग से बहुत हटकर हो गया है। पहले यह रस्म भी एक साधारण परिवारिक आयोजन हुआ करती थी, जिसमें दुल्हन के हाथों में मेहदी लगाने का काम घर की महिलाएं करती थीं। लेकिन अब मेहदी रस्म भी एक भव्य आयोजन बन चुकी है, जिसमें खासतौर पर महंगे मेहंदी आर्टिस्ट और लाइटिंग, डेकोरेशन के साथ पूरा माहौल तैयार किया जाता है। एक ओर जहां यह रस्म पारंपरिक रूप से महिलाओं के साथ सामूहिक रूप से होती थी, वहीं अब यह भी शहरी संस्कृति और दिखावे का हिस्सा बन चुकी है।
आजकल गांवों में उन परिवारों के बच्चे भी इस सुपरफिशियल संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होती। अर्थात, वे अपने माता-पिता से जिद करते हैं कि शादी में महंगे वस्त्र पहनने हैं, हल्दी और मेहदी की रस्म को धूमधाम से मनाना है ताकि दोस्तों और रिश्तेदारों को दिखा सकें कि वे शहरी जीवनशैली का अनुसरण कर रहे हैं।
यह दिखावा और बनावटी संस्कृति उन परिवारों के लिए मानसिक और आर्थिक दबाव का कारण बन रही है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत और संघर्ष में बिता दी है। खासकर गरीब या मध्यवर्गीय परिवारों में जहां एक विवाह को लेकर पहले ही काफी वित्तीय चुनौतियाँ होती हैं, इस तरह की महंगी रस्मों का आयोजन उन पर अतिरिक्त बोझ डालता है। इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर फोटोशूट्स और रील्स बनाने के चक्कर में, ये बच्चे और युवा अपने माता-पिता के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं।
आजकल गांवों में कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं, जहां दिखावे के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, जबकि वही परिवार अपनी मूल आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। यह सब केवल उस पारिवारिक सम्मान और दिखावे की खातिर हो रहा है जो कभी हमारे संस्कारों का हिस्सा नहीं था।
क्या यह सब वास्तव में जरूरी है? क्या शादी की रस्मों का असल उद्देश्य सिर्फ दिखावा करना है या फिर पारंपरिक मूल्यों को जीवित रखना है?
हल्दी और मेहदी की रस्में पारंपरिक रूप से हमारे समाज में बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थीं, लेकिन आज वे सिर्फ शहरी फैशन और दिखावे का हिस्सा बन गई हैं। यदि हमें अपनी संस्कृति और समाज को बचाए रखना है, तो हमें इन रस्मों को उनके वास्तविक उद्देश्य में ही निभाना होगा।
हमारे युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि दिखावा सिर्फ असली खुशियों की राह में रुकावट डालता है। विवाह एक पवित्र संस्कार है, न कि एक प्रदर्शन। हम सबको मिलकर फिजूलखर्ची की इस प्रवृत्ति को रोकने और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखने की दिशा में काम करना चाहिए।












