October 30, 2026 11:59 am

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परमात्मा को समर्पित भाव से किया गया कर्म बन जाता है मोक्ष का साधन : गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद

बोले, कर्तव्य भाव से किया कर्म बंधन नहीं, बल्कि बन जाता है साधना
कुरुक्षेत्र, 7 जनवरी
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के पावन सानिध्य में जिओ गीता द्वारा गीता ज्ञान संस्थानम में आयोजित पांच दिवसीय गीता चेतना शिविर आज विधिवत रूप से संपन्न हुआ। समापन अवसर पर गीता मनीषी ने श्रीमदभगवद गीता के 18वें अध्याय मोक्ष संन्यास योग का भावपूर्ण गूढ एवं अत्यंत जीवनोउपयोगी विवेचन किया।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने अपने उदबोधन में कहा कि गीता का 18वां अध्याय संपूर्ण गीता का सार है, जिसमें कर्म, ज्ञान, भक्ति और संन्यास का अनूठा समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्चा संन्यास कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्म फल की आसक्ति का त्याग है। जब मनुष्य अपने सभी कर्म परमात्मा को समर्पित भाव से करता है, तो वही कर्म मोक्ष का साधन बन जाते हैं। गीता मनीषी ने बताया कि मनुष्य को जीवन उसके चिंतन, आचरण और अनुभव से निर्मित होता है। व्यक्ति जैसा सोचता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता है। सकारात्मक चिंतन जीवन को ऊंचाइयों की ओर ले जाता है। जबकि नकारात्मक विचार मनुष्य को भीतर से कमजोर कर देते हैं। जीवन में आने वाली समस्याएं व्यक्ति को तोडऩे के लिए नहीं,बल्कि उसे मजबूत और परिपक्व बनाने के लिए आती हैं। गीता मनीषी ने कर्मयोग की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने दायित्वों का निर्वाह पूर्ण निष्ठा से करना चाहिए, लेकिन फल की अपेक्षा से मुक्त रहना चाहिए। कर्तव्य भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनाता, बल्कि साधना बन जाता है। स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने संदेश दिया कि अधिक अधिकार नहीं, बल्कि अधिक उतरदायित्व जीवन को महान बनाते हैं। जो व्यक्ति अपनेे विचारों, वाणी और कर्मों पर नियंत्रण रखता है, वही वात्सव में स्वतंत्र, शांत और सुखी होता है। इस अवसर पर डॉ विवेक कोहली ने कहा कि गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के सानिध्य में आयोजित यह पांच दिवसीय गीता चिंतन शिविर साधकों के लिए आत्मिक शांति, सदगुणों के विकास एवं जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाली अमूल्य पे्ररणा सिद्ध हुए हैं। गीता चिंतन के समापन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं एवं साधकों ने गहन शांत आत्मिक संतोष एवं सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव किया।
फोटो संख्या 1 व 2- पांच दिवसीय गीता चिंतन शिविर के समापन अवसर पर प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज तथा उपस्थित प्रतिभागी

ध्यान स्वयं में है चेतना का विकास : गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद
कुरुक्षेत्र, 7 जनवरी/ कुरुक्षेत्र दैनिक (हिन्दी बाल जी सत्यम नागपाल )
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के सानिध्य में गीता ज्ञान संस्थानम में दूसरे दिन भी ध्यान सत्र का आयोजन किया गया। इस अध्यात्मिक सत्र में भारी संख्या में साधकों और श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। इस अवसर पर स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने ध्यान के गूढ रहस्य को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में समझाते हुए कहा कि ध्यान का अर्थ केवल मंत्र जाप नहीं है, बल्कि अपने भीतर संचित विचारों, विकारों और अहंकार को शून्य करना ही सच्चा ध्यान है। जब साधक भीतर से लिप्त होता है, तभी उसकी चेतना जागृत होती है और वह परमात्मा से साक्षात जुड़ता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि ध्यान स्वयं में चेतना का विकास है। परमात्मा कोई बाहर की सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर ही विद्यमान है। उन्होंने कहा कि मन स्वभाव से चंचल होता है, किंतु निरंतर ध्यान साधना से मन शुद्ध होता है और चेतना का स्तर ऊंचा उठता है। यही विकसित चेतना मनुष्य को भय, तनाव और अशांति से मुक्त कर आत्मिक आनंद की अनुभूति कराती है।

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