June 13, 2026 2:51 am

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लैंगट्रांसप्लांट के बाद मिला जिंदगी का दूसरा मौका

लैंगट्रांसप्लांट के बाद मिला जिंदगी का दूसरा मौका

अनिल कुमार गुप्ता दिल्ली
नई दिल्ली, 26 मई : फरीदाबाद की 65 साल की महिला, जो स्क्लेरोडर्मा नामक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी के कारण गंभीर इंटरस्टीशियल लैंग डिजीज से जूझ रही थीं, आज लैंगट्रांसप्लांट के एक साल बाद स्वस्थ और सामान्य जीवन जी रही हैं। बीमारी के कारण उनके फेफड़े लगभग पूरी तरह खराब हो चुके थे और उन्हें हर मिनट 4 से 5 लीटर ऑक्सीजन की जरूरत थी। हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि उनके लिए सामान्य बातचीत करना, चलना-फिरना या रोजमर्रा के छोटे काम करना भी बहुत मुश्किल हो गया था। लगातार इलाज के बावजूद उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई, जिसके बाद उन्हें इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में बाईलेटरल लैंगट्रांसप्लांट कराना पड़ा। यह दिल्ली के किसी प्राइवेट अस्पताल में किया गया पहला सफल लैंगट्रांसप्लांट माना जा रहा है। ट्रांसप्लांट के एक साल बाद अब मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत नहीं है और वह धीरे-धीरे सामान्य जीवन की ओर लौट रही हैं। रेगुलर फिजियोथेरेपी, न्यूट्रिशनल केयर और काउंसलिंग की मदद से उनका स्वास्थ्य लगातार बेहतर हो रहा है।

अंगदान और फार्मेसी की मेहनत से संभव हुई सफलता
यह कॉम्प्लेक्स सर्जरी नोएडा के एक 48 वर्षीय ब्रेन-डेड मरीज के परिवार द्वारा अंगदान का फैसला लेने के बाद संभव हो डोनर के फेफड़े मिलने के बाद अपोलो अस्पताल की मेडिकल टीम ने तेजी से पूरी प्रक्रिया को अंजाम दिया। करीब सात घंटे तक चली इस सर्जरी के दौरान मरीज को एकमो सपोर्ट पर रखा गया, ताकि शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई बनी रहे। ट्रांसप्लांट के बाद रिकवरी की प्रक्रिया भी बहुत लंबी और चुनौतीपूर्ण रही। मरीज को वेंटिलेटरी सपोर्ट, ट्रेकियोस्टोमी और 15 से अधिक ब्रोंकोस्कोपी डाइट से गुजरना पड़ा। धीरे-धीरे उनकी स्थिति में सुधार हुआ और बाहरी सपोर्ट हटा दिया गया। कुछ ही हफ्तों में उन्होंने खाना खाना शुरू किया और ताकत वापस आने लगी।

फार्मेसी के अनुसार लैंगट्रांसप्लांट चिकित्सा क्षेत्र की सबसे कॉम्प्लेक्स डाइट में मिलती है। दान किए गए फेफड़ों में से केवल 15 से 20 प्रतिशत ही ट्रांसप्लांट के लिए उपयोग योग्य होते हैं, जबकि कई मरीजों को समय पर फेफड़े नहीं मिल पाते। डॉ. मुकेश गोयल ने कहा कि अब दिल्ली-एनसीआर में भी उन्नत लैंगट्रांसप्लांट सुविधा उपलब्ध होने से मरीजों को चेन्नई या हैदराबाद जैसे शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वहीं डॉ. अवधेश बंसल ने कहा कि यह सफलता केवल ट्रांसप्लांट तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीजों की लंबी रिकवरी, मल्टीडिसिप्लिनरी केयर और निरंतर पुनर्वास का भी परिणाम है। मरीजों ने यह भी कहा कि ट्रांसप्लांट से पहले वह चौबीसों घंटे ऑक्सीजन पर निर्भर थे, लेकिन अब वह अपने दैनिक कार्य खुद कर पा रही हैं और सावधानियों के साथ सामान्य जीवन फिर से शुरू कर रही हैं।

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