उपनिषदों में है वैश्विक समस्याओं का समाधान-डॉ. रामचन्द्र (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)
गाजियाबाद,बुधवार 13 मई 2026 केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के तत्त्वावधान में उपनिषदों में प्रश्नोत्तर विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया.य़ह क़ोरोना काल से 780 वाँ वेबीनार था।
वैदिक प्रवक्ता डॉ. राम चन्द्र (विभागाध्यक्ष संस्कृत कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) ने कहा कि भारत की ज्ञान परम्परा वेद से प्रारंभ होकर उपनिषदों तक की एक महान विश्व यात्रा की तरह है।भारत के ऋषियों ने अरण्य में एकांत साधना के द्वारा प्रकृति जीव एवं परमात्मा के जिन सूक्ष्म रहस्यों को आत्मसात किया उन्हें उपनिषदों के माध्यम से प्रकट किया गया है।गत हजारों वर्षों से उपनिषदों के ज्ञान ने पूरी मानवता को आलोकित किया है।उपनिषदों के अध्ययन से सृष्टि के रहस्य स्पष्ट होते हैं और जीवन की सभी समस्याओं के समाधान भी प्राप्त होते हैं।उनके अध्ययन से संपूर्ण ब्रह्मांड आपके किसी एक विशेष ध्येय के लिए साधन बन जाता है और आप स्वयं में कृतकृत्यता की अनुभूति करते हैं। व्यक्ति के लिए संसार की प्रत्येक वस्तु ब्रह्म से अनुप्राणित हो जाती है और वह सांसारिक क्लेश एवं तनाव से मुक्त होकर अत्यंत सहजतापूर्वक जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर लेता है।डॉ. रामचन्द्र ने कहा कि उपनिषदों की संख्या 100 से भी अधिक है पर उनमें 11 उपनिषदें प्रमुख मानी जाती हैं- ईश,केन,कठ,प्रश्न,मुंडक,मांडूक्य, ऐतरेय,तैत्तिरीय,छान्दोग्य, बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर। उपनिषदों की भाषा बहुत ही सरल एवं प्रभावी है।जीवन के रहस्य को इनमें प्रश्न उत्तर के माध्यम से समझाया गया है।कठोपनिषद् में नचिकेता एवं यमाचार्य के संवाद से जीवन के उद्देश्य एवं मृत्यु के बाद की स्थिति को स्पष्ट करते हुए ओम् की साधना को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है।प्रश्नोपनिषद् में महर्षि पिप्पलाद के साथ छ: ऋषियों ने संवाद करके अनेक रहस्य पूर्ण प्रश्नों के समाधान प्राप्त किये हैं। मुण्डकोपनिषद् में शौनक एवं अंगिरस के संवाद से परा एवं अपरा विद्या के सूक्ष्म रहस्यों को उद्घाटित किया गया है।मांडूक्य उपनिषद् वेदांत के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करता है।ऐतरेय एवं तैत्तिरीय में पंच महाकोश एवं जन्म प्रक्रिया से संबंधित प्रश्नों पर गंभीर विचार हुआ है।मुख्य वक्ता ने कहा कि छान्दोग्य एवं बृहदारण्यक आकार की दृष्टि से सबसे बड़े हैं।इन दोनों में भारतीय ज्ञान परंपरा के इतिहास के अनेक मूल संदर्भ भरे पड़े हैं।नारद सनत्कुमार,जनक याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी गार्गी के प्रसंग हमें प्रकृति के गंभीर स्वरूप के साथ-साथ सृष्टि प्रक्रिया के सूक्ष्म रहस्यों से भी परिचित कराते हैं।वर्तमान समय में संसार जिस प्रकार की विकराल समस्याओं से घिरा हुआ है और मनुष्य का वैचारिक धरातल क्षीण हो रहा है उस समय में उपनिषदों का अध्ययन इन समस्याओं के समाधान में सबसे महत्वपूर्ण प्रकाश स्तंभ सिद्ध हो सकता है।
मुख्य अतिथि डॉ. गजराज सिंह आर्य व अध्यक्ष कृष्ण कुमार यादव ने भी अपने विचार व्यक्त किए
परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया व प्रदेश अध्यक्ष प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया।












