October 17, 2026 6:50 pm

भारतीय ग्रामीण पत्रकार संघ ट्रस्ट

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सत्य का स्वर,असत्य का शोर

सत्य का स्वर,असत्य का शोर

ऊँची आवाज़ों में अक्सर,भ्रम का बाज़ार सजता है,
सत्य का दीपक मौन रहकर,युगों तक उजियारा रचता है।
झूठ क्षणिक ताली का भूखा,हर पल रूप बदलता है,
सच परम चेतना बनकर,ब्रह्माण्ड के कण-कण में पलताहै

असत्य को प्रमाण नहीं,केवल प्रचंड प्रदर्शन चाहिए,
सत्य को किसी मंच का नहीं,आत्मदीप्त दर्शन चाहिए।
झूठ शब्दों का तूफ़ान है,जो पलभर में बिखर जाता है,
सच ईश्वर की वाणी बनकर,मौन में भी अमर हो जाता है।

झूठ अहंकार की प्रतिध्वनि है,स्वयं से ही हार जाता है,
सत्य आत्मा का निनाद है,काल से भी पार जाता है।
कोलाहल का जीवन सीमित,मौन का आकाश अनंत है,
जिसके अंतर्मन में सत्य जगे,वही वास्तविक संत है।

स्वर की ऊँचाई से,विचारों की ऊँचाई नहीं मापी जाती,
सत्य की सुगंध बिना कहे भी, ब्रह्मांड में स्वयं फैल जाती।
झूठ समय का बंदी बनकर,इतिहास में खो जाता है,
सच सनातन प्रकाश बनकर,प्रत्येक युग में मुस्काता है।

जब ह्रदय निर्मल होता,तब शब्द शोर नहीं करना पड़ता
सत्य स्वयं साक्षी हो,किसी को ज़ोर नहीं करना पड़ता।
असत्य की गूँज क्षणभंगुर,सत्य का स्पंदन शाश्वत है,
धीमे स्वर में बोला सच ही,सृष्टि का वास्तविक मंत्र है।

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