November 8, 2026 1:04 am

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आई आई टी बाबा की कहानी: बच्चों की भटकन से समाज को सीखने की ज़रूरत

(भाग – 1)लेखिका सुनीता कुमारी पुर्णिया बिहार

144 साल बाद प्रयागराज में आयोजित पूर्ण कुंभ महापर्व में साधु-संतों और नागा साधुओं के साथ आमजन भी बड़ी संख्या में स्नान करने पहुंचे। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य मानव शरीर के जल को पवित्र जल से जोड़कर मानसिक और शारीरिक शुद्धि करना है। गंगा स्नान को सनातन परंपरा में विशेष स्थान मिला है, और कुंभ स्नान इसी का व्यापक स्वरूप है।इस बार के कुंभ में सबसे अधिक चर्चा आईआईटी वाले बाबा अभय सिंह की हो रही है। उनका जीवन समाज को झकझोरने वाला है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर क्यों आज का युवा भटकता है, अवसाद में चला जाता है या नशे की गिरफ्त में फंस जाता है।*अभय सिंह: एक प्रेरक लेकिन चेतावनी देने वाली कहानी*आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थान से पढ़ाई करना हर माता-पिता और छात्र का सपना होता है। अभय सिंह ने भी कड़ी मेहनत और लगन से यह उपलब्धि हासिल की। लेकिन समाज की कुरीतियों और अव्यवस्था ने उन्हें ऐसा तोड़ा कि वे आध्यात्मिक मार्ग पर निकल पड़े।कहा जाता है कि नशे की लत ने उनकी जिंदगी को बदल दिया। लेकिन यह लत भी कहीं न कहीं समाज में आत्मविश्वास और सहयोग की कमी का परिणाम है। समाज के कमजोर बच्चे, जिन्हें सहारा मिलना चाहिए, अक्सर गलत संगति में पड़कर अपने जीवन की दिशा बदल लेते हैं।*परवरिश और समाज की भूमिका*माता-पिता के आपसी रिश्ते और घर का वातावरण बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन परिवारों में प्रेम और आपसी समझ होती है, उनके बच्चे मानसिक रूप से मजबूत होते हैं और जीवन में सकारात्मकता का संचार करते हैं। लेकिन जहां परिवार में कलह होती है, वहां बच्चे कुंठित हो जाते हैं और भटक जाते हैं।अभय सिंह की कहानी इस बात का प्रमाण है कि हमारी सामाजिक संरचना में बदलाव की आवश्यकता है। सदियों से महिलाओं के प्रति कमजोर दृष्टिकोण और असमानता बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यदि समाज ने इनसे सीख नहीं ली, तो और भी बच्चे ऐसे ही भटकते रहेंगे।*समाज को आत्ममंथन की जरूरत*आईआईटी बाबा अभय सिंह का जीवन उन हजारों युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो गलत दिशा में चले जाते हैं और उनकी कहानियां कभी सामने नहीं आ पातीं। उनकी कहानी एक चेतावनी है कि परिवार और समाज को अपने मूल्यों पर पुनर्विचार करना होगा।जो माता-पिता अभी भी बच्चों की अहमियत नहीं समझते, वे अपने बच्चों को भटकते देखेंगे और समय निकल जाने के बाद कुछ नहीं कर पाएंगे। बदलाव का यह सही समय है।*विचार करें और समाज को बचाने की दिशा में एक कदम बढ़ाएं।

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